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अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में यूं ही नहीं किया अकेले चुनाव लड़ने का फैसला, जरा पूरी पिक्चर समझिए


नई दिल्ली:

अरविंद केजरीवाल ने रविवार को घोषणा की कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए उनकी पार्टी कांग्रेस से गठबंधन नहीं करेगी. केजरीवाल दिल्ली में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं. इससे पहले लोकसभा चुनाव के लिए आप और कांग्रेस ने समझौता किया था. लेकिन यह समझौता बीजेपी को दिल्ली की सभी सात सीटें जीतने से नहीं रोक पाया था.आप दिल्ली में लगातार तीन बार से सरकार चला रही है.वहीं कांग्रेस पिछले दो चुनाव से शून्य पर सिमट गई है. लोगों को उम्मीद थी कि अगर दिल्ली के चुनाव में आप और कांग्रेस एक साथ आ जाएं तो हो सकता है कि कांग्रेस की स्थिति थोड़ी सुधर जाए. आइए यह समझने की कोशिश करते हैं कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का समझौता न होने से किस पर क्या असर पड़ेगा. 

दिल्ली की राजनीति

दिल्ली विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं.आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के नेता लगातार समझौते की संभावना से इनकार कर रहे थे. केजरीवाल ने इस पर मुहर लगा दी है. तीन दिन पहले ही हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद भी दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने कहा था कि उनकी पार्टी सभी 70 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी. उन्होंने लोकसभा चुनाव में हुए समझौते को गलती बताया था. उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी फिर यह ब्लंडर नहीं करेगी. वहीं आप के प्रवक्ताओं ने कहा था कि उनकी पार्टी अकेले ही बीजेपी और कांग्रेस ने निपटने में सक्षम है. 

आम आदमी पार्टी अभी भी विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है.

आम आदमी पार्टी अभी भी विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है.

दिल्ली में पिछले तीन बार से आम आदमी पार्टी की सरकार चल रही है. बीजेपी ने लगातार अरविंद केजरीवाल की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. कथित शराब नीति घोटाले में सीएम और डिप्टी सीएम से लेकर आप के सांसद और कई नेताओं तक को जेल जाना पड़ा. वहीं उसके एक और मंत्री को भी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी. उसके कुछ विधायक भी ऐसे ही आरोपों में जेल में हैं. बीजेपी लगातार भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर सड़क पर रही है. इसी का दबाव रहा कि जेल से आने के बाद अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा.वहीं कांग्रेस इन सालों में केजरीवाल सरकार के खिलाफ सड़क पर नहीं आ पाई है. उसके नेता बयानबाजी तक ही सीमित रहे हैं. चुनाव नजदीक आता देख दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाना शुरू किया. इससे पहले उस वक्त कांग्रेस के साथ समझौता कर लिया था, जब अरविंद केजरीवाल की पार्टी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे. यह वही आप थी, जिसने भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर कांग्रेस को अर्श से फर्श पर ला दिया था.

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दिल्ली में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव

वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिश्र दिल्ली की राजनीति को पिछले कई दशक से देख-समझ रहे हैं. वो कहते हैं कि दिल्ली का वोटर लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अलग-अलग वोट करता है. इस ट्रेंड को पिछले कई चुनावों से देखा जा रहा है. दिल्ली की जनता पिछले तीन बार से दिल्ली की सभी लोकसभा सीटें बीजेपी को दे रही है.वहीं वह विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को लगातार मजबूत कर रही है.वो कहते हैं कि आप के मजबूत होने से कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली गई.

अरविंद केजरीवाल के साथ सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया को भी भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

अरविंद केजरीवाल के साथ सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया को भी भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

साल 2012 में स्थापना के बाद आम आदमी पार्टी ने 2013 का विधानसभा चुनाव लड़ा था. उस समय दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. भ्रष्टाचार विरोध के नारे के साथ राजनीति में शामिल हुई आप ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया. जनता ने आप को हाथों हाथ लिया. अपने पहले ही चुनाव में आप ने 29.64 फीसदी वोट के साथ 28 सीटें जीत ली थीं. वहीं दिल्ली में तीन बार से सरकार चला रही कांग्रेस 24.67 फीसदी वोट के साथ केवल आठ सीटों पर सिमट गई थी. ही जीत पाई थी. वहीं बीजेपी ने 34.12 फीसदी वोट के साथ 31 सीटें जीतीं.इस चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला. बाद में कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देकर आप की सरकार बनवाई. लेकिन यह सरकार बहुत अधिक दिन नहीं चल पाई. साल 2015 में फिर से चुनाव कराना पड़ा. 

दिल्ली में आप की प्रचंड आंधी

साल 2015 के चुनाव में आप ने शानदार प्रदर्शन किया. आप ने दिल्ली की 70 में से 67 सीटों पर कब्जा जमाया. वहीं 2013 में 31 सीटों जीतने वाली बीजेपी तीन सीटों पर समझ गई. वहीं आठ सीटें जीतने वाली शून्य पर सिमट गई. इन दोनों दलों को न केवल सीटों बल्कि वोटों का नुकसान उठाना पड़ा. बीजेपी 34.12 फीसदी से घटकार 32.78 पर रह गई. वहीं कांग्रेस 24.67 फीसदी वोटों से घटकर 9.70 फीसदी पर आ गई. वहीं आप के वोटों में झप्पर फाड कर इजाफा हुआ. उसका वोट 2013 की तुलना में 29.64 फीसदी से बढ़कर 54.59 फीसदी हो गया. यह आप का अबतक का सबसे शानदार प्रदर्शन था. 

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने अपने पहले चुनाव में 28 सीटें जीत ली थीं.

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने अपने पहले चुनाव में 28 सीटें जीत ली थीं.

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वहीं 2020 के चुनाव में भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ. बीजेपी ने 2015 की तुलना में अपना वोट बढ़ाते हुए 32.78 फीसदी से 40.57 फीसदी कर लिया. लेकिन करीब आठ फीसदी वोट बढ़ने के बाद उसकी सीटें केवल पांच ही बढ़ीं. बीजेपी ने 2015 में तीन सीटें जीती थीं, उसे 2020 में आठ सीटें मिलीं. वहीं कांग्रेस के वोटों का गिरना जारी रहा. साल 2015 में 9.70 फीसदी वोट लाने वाली कांग्रेस का वोट घटकर 4.63 फीसदी रह गया. वहीं आप का प्रदर्शन थोड़ा खराब तो हुआ.  लेकिन ऐसा नहीं था कि जिसे शानदार प्रदर्शन न कहा जाए. आप ने 2015 में 54.59 फीसदी वोटों के साथ 67 सीटें जीतने वाली आप इस चुनाव में 53.57 फीसदी वोटों के साथ 62 सीटें जीतनें में कामयाब रही. उसे पांच सीटों और 1.02 फीसदी वोटों का नुकसान उठाना पड़ा.

दिल्ली में कौन बनाता है सरकार

दिल्ली के चुनावों के इस ट्रेंड पर मनोज मिश्र कहते हैं कि दिल्ली में जो दल वोटों का विभाजन करा पाने में कामयाब होता है, उसे सत्ता मिलती है.इसका उदाहरण देते हुए 1993 के चुनाव का जिक्र करते हैं, जब दिल्ली में अंतिम बार बीजेपी की सरकार बनी थी. उस चुनाव में बीजेपी को 42.82 फीसदी वोट के साथ 49 सीटें मिली थीं.वहीं कांग्रेस को 34.48 फीसदी वोट और 14 सीटें मिली थीं.वह चुनाव जनता दल ने भी लड़ा था. उसे चार सीटें और 12.65 फीसदी वोट मिले थे.वोटों का बंटवारा या त्रिकोणीय मुकाबला होने का फायदा बीजेपी को मिला और वह सरकार बनाने में कामयाब रही.इसी ट्रेंड को हम पिछले तीन विधानसभा चुनाव में भी देख सकते हैं. 

दिल्ली में न्याय यात्रा निकालते कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र यादव और अन्य नेता.

दिल्ली में न्याय यात्रा निकालते कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र यादव और अन्य नेता.

मनोज मिश्र कहते हैं कि दिल्ली तीन तरफ से हरियाणा से घिरी हुई है.पिछले दिनों हुए हरियाणा के चुनाव में कांग्रेस वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई, जिसकी उम्मीद की जा रही थी.मिश्र कहते हैं कि इससे आप ने अनुमान लगाया होगा कि अगर कांग्रेस की हरियाणा में सरकार होती तो, उसे उसका फायदा दिल्ली में मिलता. लेकिन ऐसा न होने की वजह से अब कांग्रेस को कोई फायदा मिलने की उम्मीद नहीं है.इससे आप को कांग्रेस से गठबंधन का कोई फायदा नजर नहीं आया होगा. इसलिए उसने अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला किया है. 

दिल्ली में कांग्रेस का भविष्य

मिश्र एक और बात की ओर इशारा करते हैं.वो कहते हैं कि अगर कांग्रेस और आप में समझौता हो जाता तो हो सकता है कि कांग्रेस को कुछ सीटें मिल जाती है. इससे कांग्रेस के लिए दिल्ली में स्पेश मिल जाता है, जहां वह शून्य पर है.लेकिन कांग्रेस के मजबूत होने का नुकसान आप को ही उठाना पड़ता.इसलिए भविष्य में होने वाले किसी नुकसान या मिलने वाली चुनौती से बचने के लिए ही आप ने कांग्रेस से समझौता न करने को बेहतर समझा है.  

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होते बीजेपी के नेता.

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होते बीजेपी के नेता.

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मिश्र कहते हैं कि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए 45 फीसद से अधिक वोट लाना जरूरी है. उनकी यह बात पिछले तीन चुनावों में नजर भी आती है. दिल्ली में वोट तीन हिस्सों में बंट जाने की वजह से 2013 के चुनाव में किसी पार्टी को साफ बहुमत नहीं मिला था.आप ने 2015 और 2020 के चुनाव में 50 फीसदी से अधिक वोट लाकर प्रचंड बहुमत से अपनी सरकार बनाई थी.इस बार की संभावना के सवाल पर मिश्र कहते हैं कि बीजेपी अभी भी आप के वोट बैंक में सेंध नहीं लगा पाई है. दिल्ली का मध्य वर्ग,झुग्गी झोपड़ी, पूर्वांचली, मुसलमान जैसे वोट बैंक अभी भी उसके साथ बना हुआ है. वो कहते हैं कि बीजेपी अपना वोट बैंक बढ़ा भी नहीं पाई है. ऐसे में वह 30-35 फीसदी वोट तो जरूर ले लेंगी. लेकिन केवल उतने से सरकार बन जाए, उसमें संदेह है.कांग्रेस के संभावना के सवाल पर मिश्र कहते हैं कि कांग्रेस अभी नेतृ्त्व के संकट से गुजर रही है.उसके पास जमीनी नेताओं की कमी है. उसके कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जा चुके हैं.ऐसे में इस चुनाव में भी कांग्रेस के लिए बहुत कुछ नजर नहीं आ रहा है. 

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