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गुटबाजी, दलित वोटों से दूरी और ओवर कॉन्फिडेंस… हरियाणा में इन 5 वजहों से जीती हुई बाज़ी हार गई कांग्रेस


नई दिल्ली/चंडीगढ़:

हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सभी एग्जिट पोल के अनुमानों को गलत साबित करते हुए जीत की हैट्रिक लगाई है. सभी एग्जिट पोल में राज्य में कांग्रेस की बंपर जीत का अनुमान जताया गया था. हरियाणा में शुरुआत से कांग्रेस ने बढ़त भी बनाए रखी थी. कुछ देर तक राज्य में कांग्रेस एक तरफा जीत हासिल करती दिख रही थी. एक समय तो पार्टी 65 सीटों तक पहुंच गई थी. लेकिन सुबह 9:30 बजे बाजी पलटनी शुरू हुई. 10 बजे तक BJP और कांग्रेस 43-43 सीटों पर आ गईं. करीब 11 बजे से BJP के नंबर 47 से 51 के बीच हो गए. बाद में BJP का फाइनल स्कोर 48 सीट रहा.

हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 48 सीटें जीती और बहुमत के आंकड़े 46 को पार कर लिया. BJP को पिछले चुनाव की तुलना में इस बार 8 सीटों का फायदा हुआ है. हरियाणा चुनाव में कांग्रेस ने 37 सीटें जीती हैं. JJP खाता भी नहीं खोल पाई. पिछले चुनाव में JJP ने 10 सीटें जीती थी. 2 सीटें INLD-BSP गठबंधन ने जीती. अन्य के खाते में 3 सीटें गईं.

आइए समझते हैं आखिर हरियाणा में कांग्रेस से कौन सी 5 गलतियां हुईं, जिससे वह चुनाव जीतते-जीतते हार गई:-

1. हुड्डा पर जरूरत से ज्यादा किया भरोसा
हरियाणा में चुनाव से पहले ही कांग्रेस के दो धड़े काम कर रहे थे. पहला खेमा पूर्व CM भूपेंद्र सिंह हुड्डा का था. दूसरे खेमे में रणदीप सुरजेवाला और कुमारी शैलजा थे. कांग्रेस को हुड्डा और उनकी बातों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना महंगा पड़ गया. हुड्डा फैक्टर की वजह से ही कई बार कांग्रेस पार्टी के अंदर की कलह पब्लिक फ्रंट में आ गई. 
कुमारी शैलजा चुनाव लड़ना चाह रही थीं. लेकिन हुड्डा की नाराजगी के चलते कांग्रेस ने उन्हें टिकट ही नहीं दिया. इससे दलित वोटर्स भी पार्टी के हाथ से छिटक गए. अगर कांग्रेस पार्टी की अंतर्कलह को सुलझा लेती, तो आज नतीजे एग्जिट पोल जैसे होते.

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2.AAP से दूरी ने भी किया नुकसान
देखा जाए तो कांग्रेस को हरियाणा में सबसे ज्यादा नुकसान AAP से दूरी बनाने से हुआ. भूपेंद्र हुड्डा हरियाणा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के गठबंधन के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं थे. AAP ने कई बार गठबंधन तय करने की डेडलाइन दी. कांग्रेस टाल-मटोल करती रही. आखिरकार AAP ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और 90 में से 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई. AAP के ज्यादातर प्रत्याशी 1000 वोटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाए. लेकिन AAP ने कांग्रेस का खेला जरूर कर दिया. AAP और कांग्रेस के अलग-अलग चुनाव लड़ने से दलित और OBC वोट BJP की तरफ झुके. अगर AAP और कांग्रेस हरियाणा में साथ-साथ लड़ती, तो शायद नतीजे कुछ और होते.

3 जाट बनाम गैर-जाट की लड़ाई
हरियाणा में कांग्रेस जाट बनाम गैर-जाट की लड़ाई भांपने में नाकाम रही. राज्य में करीब 22% जाट वोट हैं, जो खुलकर अपनी बात रखते हैं. गैर जाट वोट बैंक को लगा कि कांग्रेस के जीतने पर भूपिंदर सिंह हुड्डा ही हरियाणा के मुख्यमंत्री बनेंगे, इसलिए उन्होंने खामोशी से BJP का पक्ष ले लिया. दूसरी ओर, BJP ने जाट को छोड़कर इस बार
अपना फोकस नॉन जाट यानी OBC और दलितों पर रखा. BJP ने लोकसभा चुनाव से पहले प्रदेश में नेतृत्व ही बदल दिया. किसी जाट की जगह नायब सिंह सैनी को CM बना दिया. सैनी OBC का प्रमुख चेहरा भी थे. इस तरह BJP ने एंटी इंकमबेंसी को भी मैनेज कर लिया.

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4. मुद्दे को भांपने में नाकाम रही कांग्रेस
कांग्रेस ने हरियाणा में किसान, जवान और पहलवान का मुद्दा उठाया था. पार्टी इसे सिर्फ रैली के मंचों तक ही सीमित रख पाई. इसे हर हरियाणावी तक नहीं पहुंचा पाई. जवान के मामले में कांग्रेस और राहुल गांधी ने अग्निवीर स्कीम को  मुद्दा बनाया. लेकिन नायब सिंह सैनी ने इसी अग्निवीर स्कीम के अग्निवीरों को राज्य सरकार में नौकरी देने का ऐलान कर दिया. फिर कांग्रेस ने किसानों का मुद्दा उठाया, तो BJP ने PM पेंशन योजना, MSP का ऐलान करके डैमेज कंट्रोल कर दिया. 

5. ओवर कॉन्फिडेंस ने बिगाड़ा काम
हरियाणा चुनाव को लेकर कांग्रेस के ओवर कॉन्फिडेंस ने उसकी लुटिया डूबो दी. यहां की 10 से ज्यादा सीटों पर छोटे दल या निर्दलीय उम्मीदवार कांग्रेस की हार की वजह बने. AAP ने जहां कांग्रेस के वोटों को बांटने का काम किया. वहीं, निर्दलीयों ने भी उसका काम बिगाड़ा. दूसरी ओर BJP चुपचाप माइक्रो मैनेजमेंट करती रही. इस तरह पार्टी ने हरियाणा में तीसरी बार जीत हासिल कर नया रिकॉर्ड बना लिया.

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