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बार-बार, हर बार और कितनी बार होगी चुनाव आयोग की अग्नि परीक्षा

चुनाव आयोग के सामने हमेशा एक नई परीक्षा होती है, ये परीक्षा 1951 से जारी है. देश का पहला चुनाव कराना भी बड़ी चुनौती थी. वोटर तैयार करना और सीट का परिसीमन आसान काम नहीं था. चुनाव कराने से लेकर वोटर लिस्ट बनाने में काफी परेशानी हुई थी. खासकर रूढ़िवाद और अशिक्षा की वजह से लोग वोटर लिस्ट में नाम तक दर्ज नहीं करवाना चाहते थे, इन्हीं वजहों से 40 लाख महिलाओं का नाम दर्ज नहीं हो सका. क्योंकि इन महिलाओं को अलां की बेटी, फलां की बीवी के रूप में दर्ज किया गया था. यही नहीं पोलिंग बूथ निर्धारण करना और आवागमन की असुविधा और ऊपर से बारिश और गर्मी का भी कहर रहता है, जिसमें पोलिंग पार्टी को बूथ पर आने-जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी. 

1951 में देश की आबादी करीब 36 करोड़ थी और उस वक्त 17.25 करोड़ लोगों ने मतदान किया था, यानि 44.87 फीसदी मतदान हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे लोगों में जागरूकता फैली, साक्षरता दर में बढ़ोतरी हुई. वहीं, महिलाएं भी रूढ़िवादी पर्दे से बाहर निकलकर आईं और पुरुषों के साथ ताल में ताल मिलाकर चलने लगीं. इसमें मीडिया का भी रोल अहम रहा है. सरकारी न्यूज चैनल तो थे नहीं, ऐसे में निजी न्यूज चैनल कैसे हो सकते हैं. अखबार थे, लेकिन साक्षरता दर कम होने की वजह से आम लोग नहीं पढ़ते थे, जो थोड़ा पढ़े-लिखे थे, उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि अखबार खरीद सकें. 1951 में करीब 397 अखबार थे. एक तरह से कहा जा सकता था कि लोकतंत्र विकलांग था, विकास की रफ्तार कम थी, लोग अपनी जिंदगी को नियति मानते थे. 1951 में 53 पार्टी ने चुनाव में भाग लिया, जो 2019 में बढ़कर 673 पार्टियां हो गई है. 1951 में 17 फेज जबकि 1957 में 20 फेज में चुनाव हुए, उस समय चुनाव कराना आसान नहीं था. 2019 में 7 फेज में चुनाव हुए. 1951 में 196084 बूथ थे, जबकि 2019 में ये बढ़कर 1037848 बूथ हो गये. 1951 में 17.3 करोड़ वोटर थे, जो कि 2019 में बढ़कर 91.2 करोड़ वोटर हो गये, 2019 में 67.40 फीसदी मतदान हुआ.

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गौर करने की बात है कि 1951 में 1874 उम्मीदवार थे, जो 2019 में बढ़कर 8054 उम्मीदवार हो गये. 1951 में 24 महिलाएं लोकसभा में जीती थीं, उनकी संख्या 2019 के चुनाव में 78 हो गईं, ये पहली बार हुआ हैं कि इतनी महिलाएं लोकसभा पहुचीं हैं.

लोकतंत्र के इस सफर में चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है. बदलते दौर के साथ चुनाव आयोग ने लोकतंत्र के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का काम किया. लोकतंत्र कैसे मजबूत हो, इसका भरपूर ख्याल रखने की कोशिश भी की. चुनाव आयोग ने समय-समय पर अहम बदलाव किए. भानुमति के कुनबे जैसी अस्थायी केंद्र सरकारों के दौर से ऊब कर जब मतदाताओं में गहरी उदासी पैदा होने लगी और वे मतदान करने से मुंह मोड़ने लगे, तो चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए तरह-तरह के मतदाता जागरूकता अभियान भी चलाए. 

पहले चुनी हुई सरकार मनमानी करती थीं और अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्रपति शासन लगा देती थीं, उसमें भारी कमी आई है. हालांकि, राजनीतिक दल चुनाव आयोग पर सरकार का पिछलग्गू होने का आरोप लगाते रहे हैं. पहले मतदान के दौरान बूथ लूटने और खूनखराबा आम बात थी, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के आने के बाद बूथ लूट की इंड्रस्ट्री पर विराम लग गया. डर के कारण जो बूथ पर नहीं जाते थे, अब वे लोग बेफिक्र होकर मतदान कर रहे हैं. पहले दागी और अपराधी किस्म के उम्मीदवार पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन चुनाव आयोग और सरकार दोनों की पहल से दागी और अपराधी लोगों पर लगाम लगनी शुरू हुई. कोर्ट के द्वारा दो साल की सजा होने पर माननीय सांसद और विधायक की सदस्यता तुरंत खत्म हो जाती है, लेकिन अभी भी लोकसभा और विधानसभा में इनकी संख्या भरमार है. देश की राजनैतिक पार्टियां जब तक खराब छवि वाले उम्मीदवारों पर नकेल नहीं कसेगी, तब तक दागी और अपराधी को रोक पाना आसान नहीं होगा.

पहले उम्मीदवार चुनाव के दौरान कोई ब्यौरा नहीं देते थे, अब सारे उम्मीदवारों को हलफनामा में सारी जानकारी देनी पड़ती है. मसलन अपराधिक मामले, संपत्ति और शिक्षा की जानकारी देनी पड़ती है. गलत जानकारी देने पर सदस्यता भी जा सकती है. मतदाताओं की न्यूनतम उम्र 21 से 18 साल तक कर दी गई, जिससे युवा वर्ग में जबर्दस्त उत्साह दिख रहा है. उम्मीदवारों के खर्च की सीमा लोकसभा और विधानसभा के लिए तय कर दी गई है. अगर तय सीमा से अधिक कोई खर्च करता है, तो उस पर कार्रवाई हो सकती है. अब उम्मीदवारों को चुनावी खर्च का लेखा-जोखा भी देना पड़ता है, हालांकि इस पर लगाम लगाने में चुनाव आयोग विफल रहा है या कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग के दायरे से बाहर है, क्योंकि अभी भी चुनाव में तयशुदा सीमा से बाहर रकम खर्च की जाती है. लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार 75 से 95 लाख खर्च कर सकता है, छोटे राज्यों में 75 लाख, जबकि बड़े राज्यों में ये सीमा 95 लाख की है, जबकि विधानसभा चुनाव में खर्च की सीमा 28-40 लाख की है.

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लोकसभा और विधानसभा में सांसद और विधायक कितने दिन सत्र में शामिल हुए, कितना वक्त दिया और क्या चर्चा की, इन सारी बातों का रिकॉर्ड लोकसभा और विधानसभा में रखा जाता है. सरकार को स्थायित्व देने के लिए दलबदल कानून लाया गया, ताकि सांसद और विधायक एक दल से दूसरे दल में कूदफांद न कर सकें. मकसद है कि चुनी हुई सरकार को स्थायित्व मिले और सांसद-विधायक पार्टी के अधीन रहें और उसके उसूलों का पालन करें. अब ऐसे सदस्यों की सदस्यता जा सकती है, जो मनमाने तरीके से दूसरी पार्टी के सदस्य बन जाते हैं. पार्टी में टूट के लिए कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की आवश्यकता होती है. महत्वपूर्ण निर्णय में पार्टी के व्हिप को मानना जरूरी हो गया है, व्हिप के खिलाफ विद्रोह करना सांसद या विधायक को महंगा पड़ सकता है. सांसद और विधायक की सदस्यता खत्म करने का अधिकार लोकसभा और विधानसभा के स्पीकर के पास है.

पारंपारिक मीडिया से लेकर डिजिटल मीडिया में आई क्रांति ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल दी है. डिजिटल युग में खबरें बिजली की रफ्तार से पूरे देश में पहुंच रही हैं. साक्षरता संग जागरूकता भी बढ़ी है, लेकिन ध्रुवीकरण और विद्वेष में भी इजाफा हुआ है. चुनाव आयोग को रास्ता निकालना होगा कि मतदान में ज्यादा से ज्यादा निष्पक्षता के साथ नागरिकों की भागीदारी कैसे हो. भारतीय लोकतंत्र ने 77 साल के अपने सफर में जमीन-आसमान का बदलाव हासिल किया है. कहा जा सकता है कि देश का लोकतंत्र पहले से ज्यादा परिपक्व, मजबूत और निर्णायक हो गया है.

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धर्मेंद्र कुमार सिंह पत्रकार, चुनाव विश्लेषक और किताब ‘विजयपथ – ब्रांड मोदी की गारंटी’ के लेखक हैं…

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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