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Ground Report: कैंसर को हराकर पाई नई जिंदगी, गढ़वाल सीट से BJP की जीत की इबारत लिख पाएंगे अनिल बलूनी

लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) का 19 अप्रैल से आगाज होने जा रहा है. पहले फेज में इस दिन 102 सीटों पर वोटिंग होगी. देवभूमि उत्तराखंड (Uttarakhand Lok Sabha Seats) की 5 लोकसभा सीटों पर पहले फेज में ही एक साथ वोटिंग होनी है. यहां कि पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट हमेशा चर्चा में रहती है. इस सीट से बीजेपी (BJP) ने अनिल बलूनी (Anil Baluni) को टिकट दिया है. अनिल बलूनी ने हाल ही में कैंसर को मात दी है और अब चुनावी मैदान में उतरे हैं.

गढ़वाल संसदीय सीट का अपना इतिहास है. देवभूमि उत्तराखंड के केदारनाथ से लेकर रामनगर के जंगलों और नैनीताल की तलहटी तक फैली ये गढ़वाल लोकसभा सीट करीब 330 किलोमीटर तक फैली है. इस सीट का भक्तदर्शन, हेमवती नंदन बहुगुणा, भुवन चंद्र खंडूड़ी, सतपाल महाराज जैसे दिग्गजों प्रतिनिधित्व किया. गढ़वाल की सियासी जमीन पर हमेशा जाति का मुद्दा हावी रहा है. बीजेपी और कांग्रेस ने गढ़वाल सीट में ब्राह्मण प्रत्याशी ही उतारे हैं. बीजेपी ने यहां से अनिल बलूनी को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने इस सीट पर अपने सबसे काबिल नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल को उतारा है.

आजादी के बाद देश में पहली बार 1952 में लोकसभा चुनाव हुए. इसके साथ ही गढ़वाल सीट अस्तित्व में आ गई थी. इस सीट पर साल 1952 से 1977 तक लगातार कांग्रेस का ही कब्जा रहा. इस लोकसभा क्षेत्र के तहत 14 विधानसभा सीटें आती हैं. ये 14 सीटें उत्तराखंड के पांच जिलों चमोली, पौड़ी, नैनीताल, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल में फैली हुई हैं.

पौड़ी गढ़वाल ने उत्तराखंड को 5 मुख्यमंत्री दिए. देश के बड़े पदों पर भी पौड़ी का दबदबा है. देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) बिपिन रावत यहां से थे. जबकि नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (NSA) अजीत डोभाल भी पौड़ी से ताल्लुक रखते हैं. वर्तमान CDS अनिल चौहान भी पौड़ी के रहने वाले हैं.

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पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले नेता हैं बलूनी

2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से बीजेपी ने तीरथ सिंह रावत को उतारा था. उन्होंने बड़ी जीत भी दर्ज की थी. लेकिन इस बार बीजेपी ने उनका टिकट काटकर अनिल बलूनी को मैदान में उतारा है. बलूनी पर्दे के पीछे रहकर बीजेपी के लिए काम करने वाले नेताओं में एक हैं. जब से गढ़वाल में बीजेपी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बताया है, तकरीबन छोटे-बड़े कई कांग्रेस नेता पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. 

चुनाव प्रचार का तरीका भी अलग

बलूनी के चुनाव प्रचार का तरीका भी अलग है. वो रोज सुबह नाश्ते के बाद घर से प्रचार के लिए निकल जाते हैं. रोजाना कम से कम 250 किलोमीटर कार से यात्रा करते हैं. इस बीच जगह-जगह रुककर लोगों से मिलते हैं. कार्यकर्ताओं से बात करते हैं. कुछ सभाएं भी करते हैं. कभी-कभी रोड शो भी होते हैं. रात खत्म होने से पहले वो सहयोगियों के साथ मिलकर अगले दिन की प्लानिंग भी कर लेते हैं.

एक रोडशो के बाद सभा को संबोधित करते हुए अनिल बलूनी ने कहा, “जब मुझ पर आरोप लगाए जाते हैं. मुझे भरा-बुरा कहा जाता है, तो मुझे बहुत दुख होता है. जब मैं कैंसर से लड़ रहा था, तब भी मैं गढ़वाल के लिए सोच रहा था.” 

उत्तराखंड में कोई भी चुनाव हो, यहां इलेक्शन कैंपेनिंग में मंदिरों और ग्राम देवताओं का विशेष स्थान है. अनिल बलूनी अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान इस बात का भी खास ख्याल रख रहे हैं. उन्होंने विश्वप्रसिद्ध राहु मंदिर में भी पूजा-अर्चना की. इससे पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, “मेरा राहु-केतु ठीक है. सब ठीक है. सनातन धर्म की परंपरा के तहत मैं मंदिरों में पूजा करता हूं. जिनका राहु बिगड़ा है, वो जाने.” हालांकि, किनका राहु बिगड़ा है? बलूनी इस सवाल को टाल गए.

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अपना एजेंडे के बारे में पूछे गए सवाल पर अनिल बलूनी कहते हैं, “उत्तराखंड में ऐसी कई जगहें हैं, जहां दुनियाभर से लोग आके देखना चाहते हैं. पीएम मोदी कहते हैं कि अगला एक दशक उत्तराखंड का होगा. मैं यहां के क्षेत्रों के विकास के बारे में सोचता हूं.”

पौड़ी गढ़वाल सीट का सियासी समीकरण

गढ़वाल संसदीय क्षेत्र में 45% ठाकुर, 30% ब्राह्मण और लगभग 18% अनुसूचित जाति के मतदाता हैं. ऐसे में यहां बीते लोकसभा चुनाव तक जातिगत समीकरण हमेशा से हावी रहे हैं. पौड़ी गढ़वाल की भौगोलिक स्थिति को देखें तो रामनगर, श्रीनगर और कोटद्वार को छोड़कर ज्यादातर हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में ही आता है. इस लोकसभा सीट का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसके क्षेत्र में बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के साथ हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा भी आता है.

बीजेपी का है दबदबा

भले ही 1990 से पहले इस सीट पर कांग्रेस एक एकक्षत्र राज रहा हो, लेकिन 90 के दशक के बाद इसे बीजेपी के मजबूत किले के तौर पर देखा जाने लगा है. बीजेपी नेता जनरल बीसी खंडूड़ी सबसे ज्यदा पांच बार सांसद रहे हैं. उन्होंने 1991 से लेकर 2014 तक लगातार इस सीट पर जीत हासिल की है. इस सीट से बीच में दो बार कांग्रेस की भी जीत हुई है और दोनों ही बार सतपाल महाराज ने चुनाव जीता है. सतपाल अभी बीजेपी में आ गए हैं और कैबिनेट मंत्री हैं.

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