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Ground Report: PM मोदी की 45 घंटे की तपस्या पर क्या सोच रहे कन्याकुमारी के लोग?

माना जाता है कि यह मंदिर करीब तीन हजार साल पुराना है. पीएम मोदी ने यहां पर बीस मिनट पूजा-अर्चना की और फिर बोट के जरिए विवेकानंद रॉक मेमोरियल के लिए रवाना हो गए. 

प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार के बाद पहले भी आध्यात्मिक यात्रा पर जाते रहे हैं. 2019 के चुनाव प्रचार के बाद प्रधानमंत्री ने केदारनाथ के गरुड़ चट्टी में ध्यान लगाया था और इस बार कन्याकुमारी के विवेकानंद रॉक मेमोरियल पहुंचे हैं, लेकिन स्‍वामी विवेकानंद से उनका नाता क्या है, इस बारे में आम लोगों की अलग अलग राय है.

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आम लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम और विवेकानंद जी के बचपन का नाम भी नरेंद्र था तो यहां से भारत को विश्व गुरु बनाने का एक नया संकल्प लेकर प्रधानमंत्री दिल्ली लौटेंगे. वहीं महिलाओं ने कहा कि मोदी के रहते भारत विकसित देश बनेगा. 

इस तरह से बना था विवेकानंद रॉक मेमोरियल

हालांकि लेकिन क्या बीजेपी वैचारिक तौर पर विवेकानंद के नजदीक है. इसकी जानकारी लेने के लिए The Hindkeshariने कन्याकुमारी के विवेकानंद आश्रम के मीडिया प्रकोष्‍ठ के संयोजक कृष्ण कुमार से मुलाकात की. वो इस आश्रम में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सहसंघ संचालक एकनाथ रानाडे की समाधि दिखा कर बताते हैं कि कैसे पूरे देश भर के 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों से एक से पांच रुपए चंदा लेकर विवेकानंद रॉक मेमोरियल को बनाया गया, जबकि इस दौरान कई विरोध भी झेलने पड़े. वो बताते हैं कि सीधे तौर पर विवेकानंद आश्रम किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ा है, लेकिन भारत के दर्शन और आध्यात्म को दुनिया भर में फैलाने का काम नरेंद्र मोदी कर रहे हैं. 

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कृष्ण कुमार ने कहा कि विवेकानंद आश्रम का राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ या किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ाव नहीं है, लेकिन इत्तेफाक था कि रानाडे जी ने विवेकानंद दर्शन को पढ़ा था और जब यहां मेमोरियल बनाने लगे तो संगठन के किसी आदमी की जरूरत थी जो लोगों में सामंजस्य बैठाकर इसे बनवा पाए, इसलिए स्‍थानीय लोगों ने खुद रानाडे के पास जाकर उनको इस काम से जोड़ा. 

आध्‍यात्मिक दर्शन और विचारधाराओं का संगम 

सुदूर दक्षिण के इस छोटे से कस्‍बे कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक मेमोरियल के साथ ही महात्मा गांधी का स्‍मारक और पवित्र भगवती अम्मन मंदिर के साथ मशहूर कवि तिरुवल्‍लुवर की मूर्ति मौजूद है. इससे पता चलता है कि हजारों साल से यहां कई आध्यात्मिक दर्शन और विचारधाराओं का संगम होता रहा है. पीएम मोदी की साधना शनिवार शाम को खत्‍म हो जाएगी, लेकिन उम्मीद है कि वो यहां से नया सामर्थ्य, नई सोच और सामंजस्य के साथ विकसित भारत बनाने का मजबूत इरादा लेकर लौटेंगे.  

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