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2007 धोखाधड़ी मामला : दिल्ली हाईकोर्ट ने 60 हजार पन्नों के दस्तावेज को ट्रेस करने का दिया निर्देश

मामले में अगली सुनवाई 15 अप्रैल को की जाएगी.

नई दिल्ली:

दिल्ली हाईकोर्ट ने पटियाला हाउज कोर्ट के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज को एसके थापर के खिलाफ 2007 में दर्ज हुए धोखाधड़ी मामले से जुड़े 60,000 पेज के रिकॉर्ड को ढूंढने का निर्देश दिया है. दिल्ली हाई कोर्ट ने यह आदेश एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया है जिसमें उत्तराखंड में कुर्क की गई संपत्ति को मुक्त करने से इनकार करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है. लेकिन मामले से जुड़े रिकॉर्ड का पता नहीं लगाया जा सका है. 

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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज को मामले से जुड़े रिकॉर्ड का पता लगाने और पेश करने के लिए दो महीने का समय देते हुए निर्देश जारी किया है. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 23 जनवरी को एक आदेश दिया था. इसमें उन्होंने कहा था कि, ”जिला एंव सत्र न्यायालय के प्रधान न्यायधीश इस अदालत के दस्तावेज का पता लगाएं और सुनवाई की अगली तारीख पर इसे अदालत के सामने पेश किया जाए.” 

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि इस मामले के रिकॉर्ड को पेश करने के लिए 2 महीने का समय दिया जाता है क्योंकि यह एक 60,000 पेज का रिकॉर्ड है. उच्च न्यायालय का निर्देश मृतक अमरपाल के कानूनी उत्तराधिकारी द्वारा दायर एक याचिका पर आधारित है, जिसमें 28 अप्रैल, 2023 को ACMM-II, पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती दी गई थी. 

इस आदेश के माध्यम से, न्यायाधीश ने कहा था, दिनाक 10.12.2009 के आदेश के तहत “इस मामले में, सब-रजिस्ट्रार, रूड़की, हरिद्वार से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार, न्यायालय  ने संपत्ति की आगे की बिक्री/खरीद पर प्रतिबंध लगा दिया था.” हालांकि, यह आदेश रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है क्योंकि मामला बहुत पुराना है और न्यायिक फाइल लगभग 60,000 पेज की है. उच्च न्यायालय ने कहा, “इन परिस्थितियों में 60,000 पेज का ये दस्तावेज़ सबसे आवश्यक दस्तावेज़ है जो इस न्यायालय या निचली अदालत के समक्ष इस मामले के निर्णय का आधार बनेगा.” 

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अब इस मामले में आगे की सुनवाई 15 अप्रेल 2024 को की जाएगी. याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि विचाराधीन भूमि आवेदक के नाम पर परिवर्तित कर दी गई है, जिससे उनकी स्थिति वास्तविक क्रेता की हो गई है. राज्य ने आवेदन का विरोध करते हुए कहा कि मामले के वर्तमान चरण में आवेदक की वास्तविक स्थिति का निर्धारण करना जल्दबाजी होगी. ट्रायल कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में कहा था कि आवेदक न तो पीड़ित/निवेशक था और न ही आरोपी, बल्कि एक कथित वास्तविक खरीदार था. 

यह भी नोट किया गया कि विचाराधीन भूमि कथित तौर पर आरोपी द्वारा धोखाधड़ी से खरीदी गई थी, जिसके कारण 10 दिसंबर, 2009 के एक आदेश के अनुसार, इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

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