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'विकास शुरू होता है, खत्म नहीं…' महाकुंभ पर ' The Hindkeshariकॉन्‍क्‍लेव' में बोले स्वामी विशाल आनंद


नई दिल्ली:

प्रयागराज में चल रहे देश के बड़े आयोजन ‘महाकुंभ’ (Mahakumbh) पर ‘ The Hindkeshariकॉन्‍क्‍लेव’ में देश के सबसे बड़े संत और अर्थशास्त्री एक साथ एक मंच पर मौजूद हैं. ये संत और अर्थशास्त्री महाकुंभ के आर्थिक पहलू और उसके असर पर अपने विचार रख रहे हैं. इस दौरान ‘प्रकृति पर आस्‍था का महाकुंभ’ सेशन में स्वामी विशाल आनंद (दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के हेड ऑफ प्रोग्राम कॉर्डिनेटर) असीम अरुण ( मंत्री सोशल वेलफेयर एंड एससी-एसटी वेलफेयर , यूपी ) और मंगल प्रभाग लोढ़ा (मिनिस्स्टर ऑफ स्किल डेवलपमेंट एंट एटरपेन्योरशिप) शामिल हुए. 

मेले का मतलब मेल-जोल, नए संबंध बनाना

स्वामी विशाल आनंद ने महाकुंभ मेले पर वर्ल्डकप जैसे अन्य आयोजनों का उदाहरण देते हुए कहा कि इसका लॉन्गटर्म असर देखने को मिलता है. मेला सिर्फ होकर खत्म नहीं हो जाता है. मेला का मतलब लोगों के मेल और नए संबंध बनने से है. इसका मतलब है, जहां नए संबंध बनते हैं और नई चर्चाएं होती हैं. नई कोलैबोरेशन होती हैं. ये सब चीजें लगातार होती रहती हैं और बढ़ती रहती हैं. महाकुंभ से भारत के स्पिरिचुअल टूरिज्म को नया आयाम मिलेगा.

महाकुंभ में बिजनेस के सवाल पर क्या बोले स्वामी विशाल आनंद?

कुंभ में बिछड़ने और मिलने की बात पर स्वामी विशाल आनंद ने कहा कि ये सिर्फ एक नेरेटिव है. मेले का मतलब ही मिलना होता है. महाकुंभ को हिंदुस्तान के आध्यात्मिक वैभव का प्रतीक माना जाता है. पिछले कुछ सालों में आध्यात्म से जुड़ा कारोबार काफी बढ़ा है. कैसे वो आगे और विस्तार ले सकता है? इस सवाल के जवाब में स्वामी विशाल आनंद ने कहा कि आप इसे कारोबार कहते हैं लेकिन यह हमारी संस्कृति है. जहां भी धर्म आता है, हम वहां अर्थ लगाते हैं. बड़े महात्माओं के कुंभ जाने, टेंट लगाने, टेंट भाड़े पर उठाने, कई लोगों के कथावाचन करने को बिजनेस कहने वाले सवाल पर उन्होंने कहा कि ये सब टूरिज्म का हिस्सा है, इसे अलग तरह से देखा जाए.

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कितनी रिच है भारत की इकोनॉमी?

अगर आप अपनी संस्कृति में पीछे जाकर देखें तो हमारे कोई देवी-देवता फटे कपड़ों में नहीं दिखेंगे. वे हीरे-जवाहरात से लदे हुए हैं. ये हमारी इकोनॉमी और भारत की अर्थव्यवस्था है.वह सोने-चांदी में ही खेलती है. भारत ऐसे ही सोने की चिड़िया नहीं कहलाता था. हमारे देवी-देवता भी हीरे-जवाहरात पहने रहते थे. हमारे यहां कुछ भी अंग नहीं है. जहां हमारे शास्त्रों में ये लिखा गया कि धन का त्याग या धन किसका है. वेदों की शुरुआत करें तो पहले उपनिषद में पहला श्लोक है अगर सब जगह ईश्वर विद्यमान है तो संसार को त्यागपूर्ण भाव से भोगो.ये धन किसका हुआ है.इस पर वैदिक ऋषि ने जवाब दिया कि संसाधन भगवान से संबंधित हैं. अगर राजनीतिक लोगों को देखा जाए तो वह कहते थे कि संसाधनों पर पहला अधिकार किसी और का है. लेकिन हमारे वेद कहते हैं कि संसाधनों पर पहला और आखिरी अधिकार सिर्फ ईश्वर का है. वह संसाधन ईश्वर के कार्य में लगने चाहिए. खनन दोहन करना भारत की संस्कृति और परंपरा नहीं है. ये बाहर से आया है. भारत की परंपरा तो प्रकृति से निकालकर प्रकृति को ही अर्पण करना है. 

कुंभ की सप्लाई चेन को समझिए

भारत की इस परंपरा से जुड़ते हुए रोजगार कैसे बढ़ाया जा सकता है. इसे और आगे कैसे ले जाया जा सकता है? इसके जवाब में स्वामी विशाल आनंद ने कहा कि महाकुंभ से बहुत  लोगों को रोजगार मिल रहा है, बहुत टूरिज्म बढ़ रहा है. इस 45 दिन के कार्यक्रम के लिए देशभर में 13 हजार नई ट्रेन चलाई गई हैं. अगर इसे डिजिटल कुंभ कहा जा रहा है तो इसका मतलब सिर्फ कंप्यूटर ही नहीं है. ट्रेन सर्विसेज देने के लिए टेक्नोलॉजी का पूरा जाल बिछाया गया है.13 हजार नई ट्रेनों का नया नेटवर्क बिछाया गया, जिससे एक जगह से दूसरी जगह पर कनेक्टिविटी हो सके. ये समय सड़कें बनानेवालों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. यूपी में भी स्टेटहाईवे बनाया गया है.कितने लोग डारेक्ट और इनडायरेक्ट तौर पर इससे जुड़े हैं, चाहे होटल ही क्यों न हों. ये पूरी सप्लाई चेन है.

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विकास शुरू हता है, लेकिन खत्म नहीं होता

होटल, ट्रेन और एयरलाइन्स की सप्लाई चेन से न जाने कितने नए लोग जुड़ रहे हैं. विकास जब भी होता है तो ये खत्म नहीं होता है. एक आईएएस अकेडमी की रिपोर्ट के मुताबिक, महाकुंभ में इस बार ढाई से तीन लाख करोड़ का लेन-देन होने वाला है.इस पर 25-30 हजार करोड़ का टैक्स तो सरकार ले लेगी. इनवेस्टमेंट तो सरकार को इस रकम से वापस मिल ही जाएगी.  


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