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योगी आदित्यनाथ के लिए कितना जरूरी है उपचुनाव जीतना, अखिलेश यादव की क्या है चुनावी रणनीति


नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश की जिन 9 सीटों पर उपचुनाव का ऐलान हुआ है, उनमें गाजियाबाद, खैर, करहल, कुंदरकी, सीसामऊ, कटेहरी, मझवा,फूलपुर और मीरापुर सीट शामिल हैं.इसमें से पांच सीटों सीसामऊ,कटेहरी,करहल और कुंदरकी पर 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की थी. वहीं फूलपुर,गाजियाबाद और खैर सीट पर बीजेपी जीती थी. मीरापुर विधानसभा सीट आजकल बीजेपी की सहयोगी आरएलडी ने जीती थी. उस समय आरएलडी का सपा के साथ समझौता था. वहीं मझवां सीट निषाद पार्टी ने जीती थी. 

बीजेपी ने कितनी सीटों पर लड़ेगी चुनाव

जिन 9 सीटों पर उपचुनाव कराया जा रहा है, उनमें से आठ सीटों पर बीजेपी चुनाव लड़ेगी. वहीं मीरापुर सीट उसने आरएलडी को दी है.बीजेपी ने संजय निषाद की निषाद पार्टी को उनकी मझवां सीट भी देने से इनकार कर दिया है. इस बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने करहल और मिल्कीपुर की सीट को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है.करहल सपा प्रमुख अखिलेश यादव की सीट है. वहीं मिल्कीपुर की सीट फैजाबाद लोकसभा सीट में आती है. जहां से सपा के अवधेश प्रसाद सांसद चुने गए हैं. अयोध्या भी इसी फैजाबाद सीट में आती है. 

इस बार बीजेपी इन सीटों को जीतना चाहती है. इसलिए सीम योगी ने इन सीटों की कमान अपने हाथ में ले रखी है.बीजेपी का मानना है कि जिस तरह रामपुर सदर की सीट बीजेपी उपचुनाव में जीत सकती है, तो इन सीटों को भी जीता जा सकता है.वहीं अखिलेश यादव ने सपा की जीती सीटों पर उन्हीं लोगों के परिवार वालों को टिकट दिया है, जो अब सांसद बन गए हैं.करहल से अखिलेश यादव ने अपने चचेरे भाई तेज प्रताप को टिकट दिया है. उसी तरह सपा ने सीसामऊ से इरफान सोलंकी की पत्नी नसीम सोलंकी और कटेहरी से लालजी वर्मा की पत्नी शोभावती वर्मा को टिकट दिया है.

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उपचुनाव के लिए अखिलेश यादव की रणनीति क्या है

अखिलेश यादव का मानना है कि अब इन नेताओं की जिम्मेदारी है कि वो अपने रिश्तेदारों को कैसे जितवाते हैं.यूपी के इस उपचुनाव में दबाव बीजेपी पर है. लोकसभा में 62 से 33 सीटों पर सिमट जाने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर उपचुनाव में अधिक से अधिक सीटें जीतने का दवाब है. विपक्ष अभी से कह रहा है कि उपचुनाव में पलड़ा हमेशा सरकार की तरफ झुका होता हैं. 

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में है.बीजेपी के लिए यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है कि दिल्ली भी इसके नतीजे देखना चाहेगा कि आगे विधानसभा चुनाव के लिए क्या रणनीति बनाई जाए. यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ इस उपचुनाव मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं, क्योंकि इस उपचुनाव के नतीजों का कहीं ना कहीं उनके भविष्य से भी लेना देना है.

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