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The HindkeshariHistory: कभी दोस्त ईरान के लिए इराक से भिड़ गया था इजरायल ! अब सांप-नेवले वाली दुश्मनी क्यों?

Iran-Israel Tension:: वर्तमान में इजरायल की जनसंख्या 93 लाख 11 हजार से कुछ ज्यादा है और ईरान की जनसंख्या करीब 9 करोड़ है…दोनों के जनबल में इतना अंतर होने के बावजूद दोनों देश एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं..दुश्मनी ऐसी की दोनों मुल्क वास्तविक युद्ध के दौर में किसी भी वक्त  प्रवेश कर सकते हैं और यदि ऐसा होता है तो कई लोगों को डर है कि ये तीसरे विश्वयुद्ध की आहट होगी. फिलहाल तो पूरी दुनिया दम साधे ये देख रही है कि आगे क्या होता है? लेकिन क्या आपको पता है सांप-नेवले जैसी दुश्मनी पाले ये दोनों मुल्क कभी गहरे दोस्त हुआ करते थे? क्या आपको पता है कि दुनिया भर में ईरानी मूल के इजराइलियों की संख्या ढाई लाख से अधिक है.इसमें वे दोनों शामिल हैं जिनका जन्म ईरान में हुआ और अब इज़राइल में रह रहे हैं और वे लोग भी जो इज़राइल में हैं लेकिन वे ईरानी मूल के माता-पिता से पैदा हुए हैं. The Hindkeshariइतिहास की नई कड़ी में हम जानेंगे युद्ध के मुहाने पर खड़े दो दुश्मन मुल्क इजरायल और ईरान की दोस्ती की कहानी. इसमें हम जानेंगे कैसे ईरान के लिए इराक पर बम बरसाए थे इजरायल ने…ये भी जानेंगे कि ईरान के जिस परमाणु कार्यक्रम का हव्वा पूरी दुनिया में खड़ा किया जा रहा है उसकी शुरुआत भी दोनों मुल्कों ने मिलकर की थी. 

बात आज से 18 साल पुरानी है…साल 2006 के सितंबर के महीने की एक सुबह थी. BBC की संवाददाता फ्रासिंस हैरिसन ईरान की राजधानी तेहरान में मौजूद थी. तब उन्होंने देखा कि राजधानी तेहरान के यूसुफ़ाबाद इलाक़े में यहूदियों के प्रार्थना स्थल सिनेनॉग के सामने सूरज उगने के साथ ही भारी भीड़ जुटी और फिर बारी-बारी से लोग सिनेनॉग में घुसे और यहूदियों की पवित्र किताब तोरा का पाठ किया. इसके बाद सभी अपने-अपने काम पर रवाना हो गए.

फ्रांसिस को हैरानी हुई क्योंकि वो इजरायल के दुश्मन देश ईरान में थीं और यहां यहूदी समुदाय के लोगों को इतनी बड़ी संख्या में दिखाई देना उनके लिए खबर थी. उन्होंने जानकारी जुटाई तो पता चला कि ईरान में अनेक स्थानों पर बहुत से सिनेगॉग हैं जिनमें यहूदी अपनी धार्मिक परंपराओं का निर्वाह करते हैं. तब पूरे ईरान में यहूदियों की संख्या 25 हजार से ज्यादा थी.

बता दें कि ईरानी क्रांति के पितामह माने जाने वाले इमाम ख़मैनी ने भी यहूदियों को एक धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता दी थी और ये भी कहा था कि उन्हें संरक्षण मिलना चाहिए.

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दरअसल ईरान में जब इस्लाम का उदय नहीं हुआ था तब भी वहां यहूदी रहते थे यानी ईरान में उनका अस्तित्व 27 सौ साल पुराना है.  USA TODAY की रिपोर्ट के मुताबिक 1979 में हुई मशहूर ईरानी क्रांति के दौर में ईरान में करीब डेढ़ लाख यहूदी  रहते थे. इजरायल सरकार के द्वारा संरक्षित वेबसाइट JEWISH VIRTUAL LIBRARY में एक वाक्ये का जिक्र मिलता है.जिसके मुताबिक ईरान जिसका पुराना नाम फारस भी है. उसी के एक मशहूर राजा हुए हैं कुस्रू…वे कहते हैं-‘स्वर्ग के परमेश्‍वर यहोवा ने मुझे पृथ्वी भर का राज्य दिया है और उसी ने मुझे आज्ञा दी है कि यरूशेलम जो यहूदा में है उसमें मेरा एक भवन बनवावो. इसलिये उसकी प्रजा के सब लोगों, तुम में से जो कोई चाहे, उसका परमेश्‍वर यहोवा उसके साथ रहे, वह वहां रवाना हो जाए. मतलब यरुशेलम में बने पवित्र टेंपल माउंट का संबंध भी कहीं न कहीं ईरान से है.अब आते हैं आधुनिक दौर के इतिहास में…14 मई 1948 को जब इजराइल की स्थापना हुई तो अरब वर्ल्ड में उसे मान्यता देने वाला तुर्की के बाद दूसरा मुल्क ईरान ही था. ध्यान रहे ये वो वक्त था जब मिडिल ईस्ट के ज्यादातर मुस्लिम देशों ने इजराइल को मान्यता देने से इनकार कर दिया था. जब इजरायल के खिलाफ 8 मुस्लिम देशों ने एक साथ 6 दिनों का युद्ध लड़ा था लेकिन तब भी ईरान उसमें शामिल नहीं था. इसी दौरान एक और वाक्या हुआ था.. 15 अगस्त 1953 को जब भारत अपना छठा स्वतंत्रता दिवस मना रहा था तब अमेरिका ने ईरान में अपनी कठपुतली सरकार बनवाई.

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 ईरान में अमेरिका की कठपुतली सरकार के इजराइल से अच्छे संबंध थे. एक वक्त ऐसा था जब शाह की सत्ता के दौरान ईरान, इजराइल का मुख्य तेल सप्लायर रहा. जबकि,इस दौरान दूसरे अरब देश इजराइल से कोई संबंध नहीं रखते थे. कतर के मशहूर टीवी चैनल अल जजीरा के मुताबिक दोनों देशों के बीच तब संबंध इतने अच्छे थे कि ईरान की खुफिया एजेंसी सावाक को इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद से ट्रेनिंग मिलती थी.

कहा जाता है कि तब दोनों ही मुल्क साथ-साथ परमाणु तकनीक प्राप्त करने गुप्त मिशन में जुटे थे.दोनों के बीच संबंध तब बिगड़े जब ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई. तब अयातुल्लाह खुमैनी ने शाह पहलवी वंश के शासन को खत्म करने बाद कहा- अमेरिका बड़ा शैतान है और इजरायल छोटा शैतान.आयतुल्लाह रोहुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व वाली ईरान की नई सरकार ने इजराइल के साथ सारे संबंध तोड़ दिए. तेहरान में इजराइली दूतावास को फिलिस्तीनी दूतावास में बदल दिया गया. इसके अलावा दोनों देशों के बीच एयर रूट को भी बंद कर दिया गया. लेकिन ऐसा नहीं है कि दोनों देशों के बीच तभी से दुश्मनी चल रही है. 

22 सितंबर 1980 को एक वाक्या हुआ जिसकी वजह से दोनों देश फिर से करीब आए. दरअसल तब सद्दाम हुसैन की सेना ने अचानक ही ईरान पर हमला कर दिया था.

ईरान जंग के लिए तैयार नहीं था लिहाजा उसे भारी हानि हुई. ऐसी स्थिति में उसी साल अक्टूबर महीने में ईरान ने अपना एक डेलिगेशन इजराइल भेजा. जहां एक सीक्रेट डील हुई. नतीजा ये रहा कि 24 अक्टूबर 1980 को ईरान को स्कॉर्पियन टैंक और F-4 फाइटर जेट्स के लिए 250 टायर मिले.

अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि ईरान-इराक युद्ध के दौरान अमेरिका ईरान को हथियार भेजता था लेकिन वो हथियार उसे इजराइल के रास्ते मिलते थे. इस युद्ध के दौरान इजरायल ने एक कदम आगे बढ़ते हुए खुद ही अमेरिकी हथियार खरीदे और उसे ईरान को दिए. इसकी कीमत तब 200 बिलियन डॉलर थी.यही नहीं ईरान के आग्रह पर तब इजराइली प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने इराक में बमबारी करने के लिए कई F-16 विमान भी भेजे थे. जानकार बताते हैं कि 1979 की क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंधों में जो खटास आ गई थी उसे इजरायल इराक युद्ध के साथ ईरान का साथ देकर सुधारना चाहता था.लेकिन दोनों देशों में संबंध तब बिगड़े जब ये खुलासा हुआ कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने का काम शुरू कर चुका है. इजराइल किसी कीमत पर ये नहीं चाहता है कि मिडिल ईस्ट में किसी देश के पास परमाणु हथियार हो. तब से दोनों देशों के रिश्ते खराब होते रहे और धीरे-धीरे दुश्मनी में बदल गए. अब हालत ये है कि दोनों देश एक दूसरे को जड़ से खत्म कर देना चाहते हैं. कहा जा सकता है कि इस दोस्ती और दुश्मनी की कहानी में राजनीतिक सनक और अहम दोनों हैं.

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