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JPC के हवाले वक्फ बिलः बोफोर्स, हर्षद मेहता से अब तक, जानिए इस कमेटी की पूरी कहानी


नई दिल्‍ली:

केंद्र सरकार (Central Government) ने वक्‍फ बोर्ड संशोधन विधेयक (Waqf Amendment Bill) को संयुक्‍त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee) के पास भेज दिया है. जेपीसी इस विधेयक पर विचार करेगी और अगले सत्र में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. इसके लिए 31 सदस्‍यीय समिति बनाई गई है, जिसमें लोकसभा से 21 और राज्‍यसभा से 10 सदस्‍य शामिल हैं. बोफोर्स मामले को लेकर जेपीसी का गठन किया गया था तो हर्षद मेहता से जुड़े बैंकिंग लेनदेन मामले में भी जेपीसी ने जांच की थी. ऐसे में सवाल उठता है कि जेपीसी क्‍या करती है और उसके पास किस तरह की शक्तियां होती हैं. आइए जानते हैं. 

संसद में कई समितियां होती हैं, जिनका अलग-अलग काम होता है. हालांकि इन सम‍ितियों में मुख्‍य रूप से दो तरह की समितियां होती हैं, जिनमें से एक स्‍थायी समिति या स्‍टैंडिंग कमेटी होती है तो दूसरी तरह की समितियों को अस्‍थायी या एडहॉक कमेटी कहा जाता है. इन दोनों सम‍ितियों में बड़ा अंतर यह है कि स्‍थायी समितियां वह होती हैं, जिनका कामकाज लगातार चलता रहता है. वहीं अस्‍थायी सम‍ितियां वह होती हैं, जिन्‍हें विशेष कामकाज के लिए बनाया जाता है. यह अपनी रिपोर्ट देने के बाद निष्क्रिय हो जाती हैं. जेपीसी भी एक अस्‍थायी समिति होती है. 

जेपीसी को किसी विधेयक या किसी बड़े मुद्दे या आमतौर पर किसी घोटाले की जांच के लिए गठित किया जाता है. इसमें सत्तापक्ष के साथ ही विपक्षी दलों के सदस्‍यों को भी शामिल किया जाता है. जेपीसी के पास काफी शक्तियां और अधिकार होते हैं. 

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इस तरह से किया जाता है जेपीसी का गठन 

जेपीसी को गठित करने के लिए संसद के किसी भी एक सदन द्वारा प्रस्‍ताव पारित किया जाता है और दूसरे सदन की इसमें सहमति होती है. उसके बाद समिति में लोकसभा और राज्‍यसभा दोनों के सदस्‍यों को शामिल किया जाता है. राजनीतिक दल अपने सदस्‍यों का नाम इसके लिए आगे बढ़ाते हैं. लोकसभा सदस्‍यों की संख्‍या अधिक है तो जेपीसी में में लोकसभा सदस्‍यों की संख्‍या अधिक होती है. आमतौर पर किसी भी जेपीसी में लोकसभा के सदस्‍यों की संख्‍या राज्‍यसभा के सदस्‍यों से दोगुनी होती है.

जेपीसी के गठन में इस बात का ध्‍यान रखा जाता है कि इसमें ज्‍यादा से ज्‍यादा राजनीतिक दलों को शामिल किया जा सके, जिससे राजनीतिक दलों के बीच विवाद की आशंका कम हो जाती है. हालांकि इसमें सबसे बड़े राजनीतिक दल के सदस्‍य सबसे अधिक होते हैं. जेपीसी के सदस्‍यों की संख्‍या निश्चित नहीं है. 

किसी से भी पूछताछ का अधिकार 

जेपीसी के बाद काफी अधिकार और शक्तियां होती हैं. पूछताछ के लिए जेपीसी किसी भी व्‍यक्ति या संस्‍थान के सदस्‍यों को बुला सकती है और उनसे पूछताछ कर सकती है. यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो इसे संसद की अवमानना माना जाता है. साथ ही जेपीसी को सबूत जुटाने का भी अधिकार होता है, जो इसे बेहद ताकतवर बना देता है. यह किसी भी सरकारी संस्‍था या विभाग से भी जानकारी हासिल कर सकती है. वहीं इसके काम करने के तरीके और निष्‍कर्ष को  आमतौर पर गोपनीय रखा जाता है. 

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जेपीसी को जांच के करने के लिए तीन महीने का वक्‍त दिया जाता है. एक बार रिपोर्ट सौंपने के बाद इस जेपीसी का अस्तित्‍व अपने आप ही खत्‍म हो जाता है. हालांकि सरकार के लिए जेपीसी के सुझावों को मानने की कोई बाध्‍यता नहीं है. 

वो प्रमुख मामले जिनके लिए गठित की गई जेपीसी 

देश में कई ऐसे हाई प्रोफाइल मामले सामने आए हैं, जिनकी जांच के लिए जेपीसी का गठन किया गया. इसमें सबसे चर्चित मामला बोफोर्स घोटाला था, जिसके लिए 1987 में जेपीसी का गठन किया गया था. इस मामले में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को आरोपों का सामना करना पड़ा था.

वहीं आर्थिक जगत से जुड़े कई मामले रहे हैं, जिनकी जांच संयुक्‍त संसदीय समिति ने की है. इनमें 1992 में हर्षद मेहता से जुड़े बैंकिंग लेन-देन में अनियमितता का मामला सामने आया था, जिसे लेकर तत्‍कालीन पीवी नरसिम्‍हा राव सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी थी. इसके बाद जेपीसी का गठन किया गया था. वहीं 2001 में केतन पारेख से जुड़े स्‍टॉक मार्केट घोटाले में भी जेपीसी का गठन किया गया. वहीं 2011 के 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले और 2013 के वीवीआईपी चॉपर घोटाला में भी जेपीसी ने जांच की थी. 

वहीं 2016 में एनआरसी के मुद्दे को लेकर भी जेपीसी का गठन किया गया था. 

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