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पहले विदेश दौरे पर सऊदी अरब ही क्यों जाते हैं डोनाल्ड ट्रंप?

क्या आपको पता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले विदेश दौरे के लिए सऊदी अरब जाने का प्लान क्यों बना रहे हैं? क्या ये सिर्फ क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से उनकी दोस्ती की बात है या फिर इसके पीछे है ईरान को कंट्रोल करने का प्लान या फिर शायद इस्लामिक देशों का पैसा. चलिए आज इस वीडियो में हम इस राज को खोलते हैं. ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने हैं और व्हाइट हाउस में कदम के बाद उनका पहला विदेश दौरा- सऊदी अरब! लेकिन सवाल ये है – ऐसा क्या खास है सऊदी में कि ट्रंप वहां बार-बार खिंचे चले जा रहे हैं? क्या ये सिर्फ पैसों की डील है, या मध्य-पूर्व में कुछ बड़ा खेल चल रहा है, चलिए, एक-एक करके सारी बातें समझते हैं.

ट्रंप का सऊदी प्लान

सबसे पहले बात करते हैं कि ट्रंप का सऊदी जाने का प्लान क्या है. न्यूज वेबसाइट एक्सियोस की रिपोर्ट कहती है कि ट्रंप मई के मध्य में सऊदी अरब जा सकते हैं और ये कोई आम दौरा नहीं है. ट्रंप प्रशासन अभी गाजा में इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम को बहाल करने की कोशिश कर रहा है. हमास से बंधकों को छुड़ाने का प्रेशर है और इसी बीच ट्रंप सऊदी क्यों जा रहे हैं. 6 मार्च को ट्रंप ने खुद कहा था कि मैं सऊदी अरब जा रहा हूं, पिछली बार मैं वहां गया था तो उन्होंने 450 अरब डॉलर का निवेश किया था. इस बार मैंने कहा कि जब तक आप अमेरिकी कंपनियों को 1 खरब डॉलर नहीं देंगे, मैं नहीं आऊंगा और सऊदी ने हां कर दी यानी 4 साल में अमेरिका में 1 खरब डॉलर का निवेश. एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि इस दौरे में विदेशी निवेश, खाड़ी देशों से रिश्ते मजबूत करना और मध्य-पूर्व में शांति की बात होगी तो ये सिर्फ पैसों की डील है, या कुछ और भी है, सवाल कई हैं जो इस यात्रा के बाद साफ होंगे.

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सऊदी का बढ़ता कद 

अब बात करते हैं कि ट्रंप के आने से सऊदी अरब का कद कैसे बढ़ गया है. सऊदी आजकल इंटरनेशनल डिप्लोमेसी में बड़ा प्लेयर बन गया है. मिसाल के तौर पर – रूस और यूक्रेन की शांति वार्ता. ट्रंप ने जब इसकी शुरुआत की तो जगह चुनी गई सऊदी की राजधानी रियाद. वहां अमेरिकी और रूसी अफसरों ने बात की, यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भी पहुंचे और नतीजा ये था कि 30 दिनों के लिए दोनों देशों ने एक-दूसरे के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले रोक दिए. जानकारों का कहना है कि सऊदी चाहता था कि जब ये शांति लागू हो, तब ट्रंप वहां आएं. यानी सऊदी अब सिर्फ तेल का देश नहीं, बल्कि शांति का मंच भी बन रहा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि ट्रंप का इसमें क्या फायदा है.

ट्रंप की परंपरा तोड़ने की आदत

वैसे ट्रंप को परंपराएं तोड़ना पसंद है. 2017 में जब वो पहली बार राष्ट्रपति बने, तब भी उनका पहला दौरा सऊदी अरब ही था. उससे पहले के 5 अमेरिकी राष्ट्रपति – ओबामा, क्लिंटन, बुश – सब अपने पहले दौरे में कनाडा या मैक्सिको गए थे, लेकिन ट्रंप, वो सीधे सऊदी गए और इस बार भी वही कहानी. 2021 में बाइडेन ने यूरोप को चुना, नेटो लीडर्स से मिले, लेकिन ट्रंप फिर सऊदी जा रहे हैं, क्योंकि ट्रंप का मानना है कि सऊदी से दोस्ती उनके लिए बिजनेस और स्ट्रैटेजी, दोनों में फायदेमंद है, लेकिन क्या सिर्फ पैसा ही वजह है, नहीं, इसमें एमबीएस का रोल भी बड़ा है.

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ट्रंप और एमबीएस की दोस्ती

अब बात करते हैं ट्रंप और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, यानी एमबीएस की दोस्ती की. 20 जनवरी को ट्रंप ने शपथ ली और उसी हफ्ते पहला फोन एमबीएस को किया. दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद किसी विदेशी लीडर को उनका पहला कॉल. बातचीत में ट्रंप ने निवेश की शर्त रखी और सऊदी ने 600 अरब डॉलर देने की हामी भर दी. 2018 में जब एमबीएस पर सऊदी पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या का इल्जाम लगा, दुनिया ने उनकी आलोचना की तब बाइडेन ने तो रिश्ते भी ठंडे कर दिए, लेकिन ट्रंप  एमबीएस के साथ खड़े रहे. ट्रंप कहते हैं कि एमबीएस शानदार इंसान हैं, हमारा रिश्ता बहुत अच्छा है तो क्या ये दोस्ती सऊदी दौरे की बड़ी वजह है. शायद हां, लेकिन एक और बड़ा एंगल है – ईरान.

ईरान का कनेक्शन 

मध्य-पूर्व में शांति के लिए ट्रंप को ईरान पर कंट्रोल चाहिए और इसमें सऊदी उनका बड़ा साथी है. ट्रंप ने आते ही ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को आतंकी लिस्ट में डाला, ईरान के तेल पर प्रतिबंध कड़े किए. वो चाहते हैं कि सऊदी उनकी मदद करे, ताकि ईरान का परमाणु प्रोग्राम आगे न बढ़े. सऊदी भी नहीं चाहता कि ईरान मध्य-पूर्व में ताकतवर बने. ट्रंप ने ईरान पर परमाणु डील के लिए दबाव बढ़ा दिया है तो क्या सऊदी दौरा ईरान को संतुलित करने का प्लान है. लगता तो ऐसा ही है तो अब आप समझ गए होंगे कि ट्रंप सऊदी अरब क्यों जा रहे हैं. पैसा, दोस्ती, ईरान का खेल – सब इसमें शामिल है.

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